74 साल विभाजन के

 74 साल विभाजन के

15 अगस्त 2021 को हमारा 75 वां स्वतंत्रता दिवस है। आज हमें आज़ाद हुए 74 साल हो गए। 

आज़ादी से, एक दिन पहले देश का विभाजन भी हुआ था। अखंड भारत से दो हिस्से अलग कर, पूर्वी पाक़िस्तान और पश्चिम पाक़िस्तान बनाया गया। भारतीय और पाकिस्तानी दोनों जिन्ना को पाक़िस्तान का रचइता मानते है। लेकिन विभाजन के असली कारण क्या थे ? और क्या सिर्फ जिन्ना ही विभाजन के लिए जिम्मेदार थे ? या नेहरू, पटेल, गाँधी जी या अंग्रेजों की भी इसमें कुछ भूमिका थी ?

ऐसा कैसे हुआ होगा ? सूट बूट पहनने वाले, ठाट-बाट के शौक़ीन, शराब और पोर्क का माँस खाने वाले, पश्चिमी सभ्यता को हमेशा हिन्दू और मुसलमान दोनों ही सभ्यताओं से अच्छा मानने वाले जिन्ना, जो हमेशा राजनीती के हाशिए पर रहे, जिनको रोजा रखते या नमाज़ भी पढ़ते किसी ने कभी नहीं देखा, जो गाँधी जी के आने के बाद कॉंग्रेस छोड़ कर चले गए, जो कई कई सालो, तक ब्रिटेन में रहते थे, जिनकी वकालत की कमाई इतनी ज्यादा थी, की अंग्रजी सरकार ने उन पर सुपर टैक्स लगाया था, यही जिन्ना कैसे अचानक इतने सक्रिय हो गये, इतने ताक़तवर हो गए की, दुनिया की सबसे बड़ी, सबसे शक्तिशाली अंग्रेजी सत्ता को मजबूर कर दिया, 40 करोड़ जनता के दिलो पर राज करने वाली कॉंग्रेस को लाचार कर दिया और देश के टुकड़े करवा दिए ?

फिर ऐसा क्या हो गया, जो जिन्ना गाँधी से भी ताकतवर बन गए ?

1937 तक किसी भी राजनैतिक दल के अजेंडे में विभाजन की कोई बात नहीं थी। सिर्फ रहमत अली अकेले थे, जो अलग मुस्लिम देश की बात करते थे, और सभी राजनैतिक दलों में उपहास के पात्र बनते थे। 1937 के भारतीय आम चुनाव (जो वाइसराय की सत्ता करवाती थी) में मुस्लिम लीग और कॉंग्रेस का घोषणा पत्र, एक जैसा ही था। चुनाव के पहले, जिन्ना ने कॉंग्रेस के साथ मिल कर चुनाव लड़ने का प्रस्ताव भी रखा था। लेकिन कॉंग्रेस अपने आप को भारत में रहने वाले हिन्दू और मुस्लिम दोनों का प्रतिनिधि मानती थी, और मुसलमानों के लिए किसी भी दूसरी राजनीतिक पार्टी को मान्यता देने के पक्ष में नहीं थी। 

कॉंग्रेस ने जिन्ना और दूसरे कार्यकर्ताओं को मुस्लिम लीग ख़त्म करके कॉंग्रेस के तहत चुनाव लड़ने का, नया प्रस्ताव दिया, जो ना कभी मंजूर होना था, और ना ही हुआ। 

10 सालो के अंदर ही, विभाजन एक अनिवार्य शर्त बनता चला गया। यह विचार, एक खेल की तरह शुरू हुआ, जिसे पहले किसी ने गंभीरता से नहीं लिया, फिर धीरे धीरे इसमें और भी नए खिलाडी शामिल होते गए। देश की अखंडता को छिन्न-भिन्न करने वाले इस खेल को, बहुत ही लापरवाही, नासमझी और गैरज़िम्मेदारी से खेला गया। जिसके नतीजे में हमें विभाजन मिला। 

गाँधी जी -

धीरे-धीरे इस हार को सभी ने स्वीकार कर लिया, सिर्फ गाँधी जी थे, जो आखरी तक विभाजन के खिलाफ थे, जो अंग्रेजो से कहते थे "तुम जाओ, हमें अपने हाल पर छोड़ दो। अगर विभाजन की कीमत पर ही आज़ादी देनी है, तो हमें ऐसी आज़ादी नहीं चाहिए, हम अभी भी और 10 साल रुक सकते है, लेकिन हमें ऐसा कटा छटा हिन्दुस्तान नहीं चाहिए। "

यहाँ तक की जब 14 जून 1947 को कॉंग्रेस कार्य सिमिति ने विभाजन स्वीकार कर लिया, तब गाँधी जी ने, कॉंग्रेस और मुस्लिम लीग के सामने, एक आखरी प्रस्ताव रखा की विभाजन की शर्तें दोनों देश आपस में तय करें, और उसमे अंग्रेजो की कोई भूमिका नहीं हो। 

लेकिन इस प्रस्ताव को कॉंग्रेस और मुस्लिम लीग के साथ साथ माउंटबेटन ने भी ख़ारिज कर दिया। माउंटबेटन, यह हमेशा से चाहते थे, की इस महान राजनैतिक घटना के वही सूत्रधार बने। 

गाँधी जी का यह आखरी और अचूक राजनैतिक दांव था, जिसे नेहरू और पटेल भी नहीं समझ पाएं। 

जिन्ना -

जिन्ना 1913 में मुस्लिम लीग में शामिल हुए, उस समय तक जिन्ना कॉंग्रेस के मेंबर थे, जिन्ना मुस्लिम लीग और कॉंग्रेस दोनों के सक्रिय मेंबर बन कर, दोनों राजनैतिक दलों को, एक सामान मंच पर लाना चाहते थे। इस के मद्देनजर, 1916 में जिन्ना और कट्टर हिंदू तिलक के बीच लखनऊ पैक्ट पर समझौता हुआ, जिसमे दोनों दलों ने, अंग्रेजो को अपना साझा शत्रु माना और इससे मिल कर लड़ने पर सहमति बनी।

1905 में जब अंग्रेजो ने, हिन्दू और मुस्लिम आबादी के अनुपात में बंगाल का विभाजन कर दिया, तो जिन्ना ने इस बंग-भंग का विरोध किया था। यहाँ तक की जब 1909 में मुसलमानों ने अपने अलग चुनाव मंडल की मांग, रखी तो इसका जोरदार विरोध जिन्ना ने किया। 

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के सस्थांपक और कॉंग्रेस के कट्टर विरोधी, सैयद अहमद खान का हमेशा जिन्ना विरोध करते थे, उनको नापसंद करते थे, और फ़िरोजशाह मेहता, गोखले और तिलक के साथ समय बिताना, इनके साथ राजनीतिक चर्चाएं करना, उन्हें अच्छा लगता था। 

जिन्ना ने सूट छोड़ कर, पहली बार शेरवानी, पाकिस्तान बनने के बाद, पहनी थी।    

कॉंग्रेस -

1937 के चुनाव तक, कॉंग्रेस अपने आप को हिन्दू, दलित, सीख़ और मुसलमानो की एक मात्र प्रतिनिधि पार्टी मानती थी, जबकि 1937 में, 147 सदस्यों की कॉंग्रेस महासमिति में सिर्फ छह मुस्लिम थे, जिसमे से एक मौलाना आज़ाद, दूसरे अब्दुल अंसारी ही ऐसे थे जिन्हे, राष्ट्रीय नेता माना जा सकता था। 

ज़्यादातर ताक़तवर मुस्लिम नेता, मुस्लिम जमींदार - नवाब या तो मुस्लिम लीग के साथ थे या उनकी अपनी-अपनी अलग मुस्लिम पार्टियाँ थी, लेकिन इस बात को कॉंग्रेस ने कभी महत्व नहीं दिया। कॉंग्रेस के इस रवैये से तंग आ कर, जिन्ना कॉंग्रेस को हिन्दू पार्टी कहने लगे, और आखरी तक कॉंग्रेस को हिन्दू पार्टी ही मानते रहे। जब गाँधी जी की मृत्यु हुई तो जिन्ना का, पाकिस्तान से बयान आया "हिन्दू धर्म द्वारा पैदा किया गया एक महान व्यक्ति और महान नेता, जो हिन्दू जाति के सम्पूर्ण सम्मान, विश्वास को नियंत्रित करता था, आज नहीं रहा। "

जिन्ना के, कॉंग्रेस को सिर्फ हिन्दुओं की पार्टी मानने का विरोध, नेहरू, पटेल और गाँधी जी ने हमेशा किया, अपने आपको राष्ट्रीय पार्टी मानने के जुनून में कॉंग्रेस ने मुस्लिम लीग को कभी महत्त्व नहीं दिया, इसके उलट अंग्रेज हमेशा से मुस्लिम लीग को कॉंग्रेस के विरोध में, उकसाते रहे, और उसे सभी महत्वपूर्ण निर्णयों में शामिल करते रहें। जहाँ कॉंग्रेस, जिन्ना को कोई महत्त्व नहीं देती थी, वही अंग्रेजो के कारण जिन्ना और मुस्लिम लीग, प्रमुख राजनीतिक मुहरे बनते गए, यह बात जब तक कॉंग्रेस को समझ आई, बहुत देर हो चुकी थी। 

जिन्ना और कॉंग्रेस - 

जिन्ना, जहाँ बहुत सफल बैरिस्टर थे, वही एक बहुत ही कमजोर नेता थे, उन्हें जनता का साथ पसंद नहीं था, एक प्रकार के अंतर्मुखी थे। गाँधी जी से एकदम उलटे उन्हें आम आदमी से जुड़ना, आम आदमी के साथ घुलने-मिलने से नफरत थी। जिन्ना, गाँधी से पहले से कॉंग्रेस के सक्रिय सदस्य थे। गाँधी जी के आने से पहले, कॉंग्रेस एक बहुत ही सभ्य, अंग्रेजी रीती-रिवाज़ों, परम्पराओं को मानने वाली पार्टी थी, जो अंग्रेजी सरकार के साथ मिल कर काम करने में विश्वास करती थी। किसी बात पर, अगर अंग्रेजी सरकार का विरोध करना भी होता, तो विरोध सांकेतिक तरीके से किया जाता, सभ्य तरीके से सरकार को ज्ञापन आदि दे कर, अपनी नाराजगी जताई जाती थी।  

गाँधी जी और कॉंग्रेस -

गाँधी जी, चंपारण से आते ही कॉंग्रेस पर छा गए। अपने पहले अधिवेशन में ही, जब कॉंग्रेस ने होम रूल की मांग रखी , तो गाँधी जी ने, जनता के सामने ही कह दिया, की कॉंग्रेस जनता से जुडी नहीं है। भारतीय जनता को कोई फर्क नहीं पड़ता, अगर सत्ता विदेशी अंग्रेजो के हाथ से निकल कर, देसी अंग्रेजो को मिल जाये।

फिर धीरे धीरे कॉंग्रेस को गाँधी जी ने बदलना शुरू किया, कॉंग्रेस का भारतीयकरण होने लगा। गाँधी जी ने, कॉंग्रेस को, आम जनता की पार्टी बनाने लगे। 

अब कोई भी 25 पैसे देकर कॉंग्रेस का सदस्य बन सकता था, इसे चवन्निया मेंबर कहते थे। कॉंग्रेस के कार्यालयों से टेबल कुर्सी हटा दी गई, कॉंग्रेस के अधिवेशन अब ज़मीन पर बैठ कर, आम जनता के सामने होने लगे। फिर गाँधी जी ने, कॉंग्रेस का सदस्य बनने के लिए सूत कातना अनिवार्य कर दिया। 

जिन्ना और गाँधी जी -

यह सब पश्चिमी सभ्यता में पले-बढे जिन्ना को नागावार था, नाकाबिले-बर्दास्त था। जिन्ना तो, एक मीटिंग से, सिर्फ इसलिए उठ कर चले गए, क्योकि मीटिंग शुरू होने के बाद, उन्हें ध्यान आया, की उनके सूट के कफ़लिंक्स, शर्ट के कॉलर बटन से नहीं मिलते हैं।  

आम चुनाव -

1937 के चुनाव में कॉंग्रेस बहुमत से चुन कर आई। कॉंग्रेस ने मुस्लिम लीग को सरकार में शामिल करने से, मना कर दिया, जो की 1935 में बने 'इंडिया एक्ट' के खिलाफ जाता था। इंडिया एक्ट, मे अल्प-संख्यंकों को भी सरकार में शामिल करने का प्रस्ताव था। 

इस तरह से दूध की मख्खी की तरह, सरकार से बाहर कर देने से, जिन्ना का अहंकार बुरी तरह से आहात हो गया। जिन्ना, की ताकत, शक्ति और अहंकार को भांपने में कॉंग्रेस चूक गई। 

जिन्ना, कॉंग्रेस में हाशिए पर आते चले गए, लेकिन इस में अलग मुस्लिम लीग के पास जिन्ना को छोड़ कर, कोई भी नेता ऐसा नहीं था, जिसे राष्ट्रीय नेता समझा जाता। जिन्ना, मुस्लिम लीग के सर्वेसर्वा बनते चले गए। 

मुस्लिम लीग और जिन्ना -

वॉयसरॉय वेवल के समझाने पर कॉंग्रेस, मुस्लिम लीग के, एक सदस्य को सरकार में शामिल करने के लिए राज़ी हो गई। जिन्ना ने दावं खेलते हुए, मुस्लिम लीग की तरफ से जोगेंद्र नाथ मंडल का नाम भेज दिया। जोगेंद्र नाथ, अनुसूचित जाती से आते थे, जिन्ना के इस कदम से, कॉंग्रेस बुरी तरह से तिलमिला गई, क्योकि मुसलमानो के तरह ही, कॉंग्रेस अपने आप को, दलितों का प्रतिनिधि भी मानती थी। मौलाना आज़ाद ने इसे हास्यास्पद बताया, नेहरू ने इसकी आपत्ति, वेवल ऑफिस में दर्ज करवाई। गाँधी जी को भी यह बहुत आपत्तिजनक लगा, की उनका हरिजन, मुस्लिम लीग की तरफ से आये। 

अँग्रेजी सत्ता -

जिन्ना का यह आहात अहंकार, अंग्रेजो के लिए बहुत ही माफिक था। जैसे - जैसे जिन्ना, कॉंग्रेस को हिन्दुओ की पार्टी कहते गए, वैसे वैसे अंग्रेज, जिन्ना और उनकी मुस्लिम लीग को मुसलमानो की पार्टी मानते चले गए। मुस्लिम लीग में जिन्ना का कहा पत्थर की लकीर था। 

जिन्ना खुद बोलते थे, की अगर कॉंग्रेस, उन्हें और उनकी मुस्लिम लीग को, मुसलमानो का प्रतिनिधि मान ले, तो वह 10 मिनट में, सभी समस्याओं को हल कर सकतें हैं। 

नेहरू -

नेहरू ने जिन्ना की इस मांग को कभी नहीं माना, अंतरिम सरकार के, फिर उसके बाद आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री, भी नेहरू बने, उन्होंने सोवियत रूस की तरह अपनी सरकार की छवि, हमेशा धर्मनिरपेक्ष रखी। नेहरू, सोवियत संघ से बहुत प्रभावित थे, रूस की तरह ही नेहरू ने धर्म को महत्तव नहीं दिया, और रूस की तरह ही देश में पंचवर्षीय योजनाओं को शुरू किया। नेहरू की, इन्ही धर्मनिरपेक्ष नीतियों के कारण, शायद भारत पर कभी भी, धार्मिक उन्माद हावी नहीं हो पाया। 


नेहरू, एक बहुत ही भावुक लेखक और कवि थे, उनकी भावुकता और क़िताबी आदर्शवादिता ने कई बार, उन्हें गलत निर्णय लेने पर, मजबूर भी किया। अंग्रेजो से संघर्ष में, नेहरू ही सबसे पहले थक भी गए थे। 1960 में, अपने एक रेडियो इंटरव्यू में, नेहरू ने यह माना भी था, नेहरू ने कहा "1947 में विभाजन के समय तक हम लोग थक चुके थे, वर्षो से हम इसे खींच रहे थे। विभाजन हमारे सामने एक विकल्प की तरह था, अगर हम संयुक्त भारत को चुनते तो फिर से सालो का संघर्ष शुरू हो जाता, यह फिर कितने साल चलता, किसी को भी नहीं पता था। पँजाब और बँगाल में निरंतर होती हत्याएं भी एक समस्या थी। विभाजन हमारे सामने एक नई राह की तरह आया और हम इस पर चल पड़े। "


जिन्ना की "सीधी कारवाही " या जिसे डायरेक्ट एक्शन भी कहा जाता है, नेहरू और पटेल दोनों के लिए इतना बड़ा सरदर्द बन गया था, की इस से मुक्ति पाने के लिए, सर कटवाने के लिए भी राज़ी थे। 

पटेल -

नेहरू से भी ज्यादा पटेल, जिन्ना और मुस्लिम लीग को खतरनाक लगते थे, उन्हें पटेल में हमेशा से एक दबा छुपा कट्टर हिंदू नजर आता था। जिन्ना की सीधी कारवाही के बाद, पटेल भी सभाओं में, विभाजन की तरफ़दारी, खुलेआम करने लगे थे। गाँधी जी, पटेल का इस तरह खुलेआम विभाजन का समर्थ करने से, बहुत आहात महसूस करते थे, उन्होंने इस बारे में पटेल से कहा भी था। इसके ज़वाब में पटेल ने गाँधी जी से कहा की "उन्हें देश का एक विभाजन चाहिए या अनेक" , पटेल के इस सपाट ज़वाब ने गाँधी जी की, अखंड भारत की सदिच्छा को नष्ट कर दिया। 

पटेल कभी भी अपनी कट्टर हिंदू की छवि को छुपाते नही थे। मुस्लिम लीग और जिन्ना ने, उनकी इस कट्टर हिन्दू वाली छवि , को विभाजन का असली मुद्दा बताया। पटेल को, जिन्ना से मिलना कभी पसंद नहीं था, वह मिलने से कतराते थे, यहां तक की देश आज़ाद होने के बाद भी, जब पटेल देश के गृह-मंत्री थे, और माउंटबेटन, आज़ाद भारत के गवर्नर जनरल, तब कश्मीर मुद्दे पर, माउंटबेटन ने पटेल को, जिन्ना से बात करने की सलाह दी, जिसे पटेल टाल गए, यहाँ तक की नेहरू ने भी जिन्ना से मिलने में अनिश्चा दिखाई। 


द्वितीय विश्वयुद्ध -

1945 और 1946 में घटनाक्रम इतनी तेजी से बदला की, अंग्रेजो को भी भारत को आजादी देने की जल्दी होने लगी। 1945 में द्वितीय विश्वयुद्ध के ख़त्म होते, ब्रिटेन आर्थिक मोर्चे पर कँगाल हो चुका था। चर्चिल की लोकप्रियता पूरी तरह से ख़त्म हो चुकी थी, चर्चिल चुनाव हार गए थे, और एटली की लेबर पार्टी ने सरकार बनाई। चुनाव के पहले ही लेबर पार्टी भारत को आज़ाद करना चाहती थी। भारत पर राज करना, अंग्रेजो के लिए, अब एक बहुत खर्चे का काम बन गया था। इसी समय 18 फ़रवरी 1946 के दिन, बम्बई में नौसेना की हड़ताल हो गई। नौसेना ने विद्रोह करते हुए, यूनियन जैक निकाल कर, कॉंग्रेस और मुस्लिम लीग का झंडा, नौसेना के मुख्यालय पर फ़हरा दिया। 

जहाँ अब तक सिर्फ कॉंग्रेस का झंडा होता था, अब मुसलमानो का अलग झंडा भी लगने लगा, इस बात ने भी कॉंग्रेस को नहीं चेताया।

आख़िरकार पाकिस्तान -

अब तक जिन्ना की छवि, एक तेज़-तर्रार, कभी ना झुकने वाले, आक्रमक नेता की बन चुकी थी। मुस्लिम लीग ने भी पाकिस्तान के समर्थन में एक बहुत बड़ा जन-समुदाय खड़ा कर लिया था। कमाल की बात तो यह थी की, मुस्लिम लीग, मुसलमानो को पाक़िस्तान के सब्ज़ बाग़ दिखा दिखा कर, समर्थन जुटा रही थी, लेकिन उस समय तक, किसी को नहीं पता था की यह नया देश, यह पवित्र स्थान, यह इस्लाम की ज़न्नत - पाकिस्तान, दुनिया के नक़्शे में, आखिर बनने कहाँ वाला है ? 

हैदराबाद के मुसलमानों को लगता था, पाक़िस्तान हैदराबाद में बनेगा, उत्तर-प्रदेश के मुसलमानों को लगता था, पाक़िस्तान उत्तर-प्रदेश में बनेगा, इस क्रम में पंजाब, सिंध, बँगाल यहाँ तक की गुजरात और राजस्थान के मुस्लिम भी थे, जिन्हे लगता था की पाकिस्तान उन के घर के आस पास ही बनने वाला है।

इस दुविधा था भी पूरा फ़ायदा, मुस्लिम लीग ने अपने समर्थ को बढ़ाने में किया, इस समय भी अगर, कॉंग्रेसी नेताओ की नींद टूट जाती, और वह देश के मुसलमानो को सही स्तिथि समझा पाते, और उन्हें बताते की पाक़िस्तान बनते ही उन्हें अपने बाप दादा की ज़मीन - जायज़ाद सब यहीं छोड़ कर, एक अनजान देश में, भिखारियों की तरह, जाना पड़ेगा, तब मुस्लिम लीग अपना जन-समर्थन खो देती, और तब भी शायद विभाजन को टाला जा सकता था। 

जिन्ना के अहंकार और कॉंग्रेस की जिन्ना को कम समझने की भूल ने, ही एक अपने आप में रहने वाले, जनता से कटे, शौक़ीन, ठाट-बाट पसंद, शराब और पोर्क पसंद करने वाले, हिन्दू-मुस्लिम दोनों को तुच्छ समझने वाले, करोड़पति बैरिस्टर का काया-कल्प, पाकिस्तान के निर्माता के रूप के कर, देश को तीन टुकड़ों में बाँट दिया। 

इस हार की कीमत फिर कई लाख लोगो ने, अपनी जान देकर चुकाई।

Vishal Shukla

Comments

  1. I would like to read it completely, before any comment.

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  2. In Continuation with my earlier comment. I would like to say that Blog is a true but tough description of the great personalities related around India's separation. Congratulations.-Ashok Dixit

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  3. Very well written. This article shows your thorough study. But there are many different views about Gandhi and Jinnah's role in partition.

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    1. Definitely, history is not that simple,
      I am not able to recognise you, pl mention your name

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  4. Thanks for a Awesome information of history

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